बजरंग बाण की उत्पति तथा सकारात्मक फायदे

बजरंग बाण की उत्पति तथा सकारात्मक फायदे

बजरंग बाण हनुमानजी का एक महत्वपूर्ण मंत्र है, जिसे पूजा-अर्चना में इस्तेमाल किया जाता है। यह बाण हनुमानजी की शक्ति, साहस और शांति को बढ़ाता है। भक्त अक्सर इसे हर दिन पढ़ते हैं ताकि उन्हें सुख, समृद्धि और सुरक्षा मिले।

“वज्र का बाण” है बजरंग बाण का अर्थ। तुलसीदास ने इसे अपनी कृति “सुंदरकाण्ड” में रखा है। प्राणी को बजरंग बाण का पाठ करने से अनंत शक्ति, सुरक्षा और संयम मिलता है। यह मंत्र भक्ति और आराधना का उदाहरण है।

बजरंग बाण

हनुमानजी की अनगिनत कलाओं और अद्भुत शक्तियों का बजरंग बाण में वर्णन है। इसमें उनकी वीरता और शक्ति का बखान है। भक्तों के जीवन में सुख, संतोष और शांति लाने का दावा इस मंत्र ने किया है। बजरंग बाण का पाठ करने से व्यक्ति का मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य सुधारता है। यह मंत्र उनकी रक्षा करता है और उन्हें मुश्किलों से लड़ने में सहायता देता है। यद्यपि, एक व्यक्ति को बजरंग बाण को श्रद्धापूर्वक और पवित्र भाव से पाठ करना चाहिए। यह मंत्र भी शांति, संतुलन और ध्यान का माध्यम है, जो आत्मा की ऊर्जा को संतुलित करने में मदद करता है।

विशेष अवसरों पर भी बजरंग बाण का पाठ किया जाता है, जैसे शनिवार, हनुमान जयंती, व्यापार में सफलता प्राप्त करने और संकटों से बचने के लिए। बजरंग बाण का पाठ पूरी तरह से ध्यानपूर्वक किया जाना चाहिए। हनुमानजी की कृपा और आशीर्वाद इस मंत्र से मिल सकता है।

बजरंग बाण इस प्रकार है :-

॥ दोहा ॥

निश्चय प्रेम प्रतीत ते, विनय करें सनमान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमंत संत हितकारी ।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥०१॥

जन के काज विलम्ब न कीजै ।
आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥०२॥

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा ।
सुरसा बद पैठि विस्तारा ॥०३॥

आगे जाई लंकिनी रोका ।
मारेहु लात गई सुर लोका ॥०४॥

जाय विभीषण को सुख दीन्हा ।
सीता निरखि परम पद लीन्हा ॥०५॥

बाग उजारी सिंधु महं बोरा ।
अति आतुर यम कातर तोरा ॥०६॥

अक्षय कुमार मारि संहारा ।
लूम लपेट लंक को जारा ॥०७॥

लाह समान लंक जरि गई ।
जय जय धुनि सुर पुर महं भई ॥०८॥

अब विलम्ब केहि कारण स्वामी ।
कृपा करहु उर अन्तर्यामी ॥०९॥

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता ।
आतुर होय दुख हरहु निपाता ॥१०॥

जै गिरिधर जै जै सुखसागर ।
सुर समूह समरथ भटनागर ॥११॥

ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले।
बैरिहिं मारू बज्र की कीले ॥१२॥

गदा बज्र लै बैरिहिं मारो ।
महाराज प्रभु दास उबारो ॥१३॥

ॐ कार हुंकार महाप्रभु धावो ।
बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ॥१४॥

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा ।
ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा ॥१५॥

सत्य होहु हरि शपथ पाय के ।
रामदूत धरु मारु धाय के ॥१६॥

जय जय जय हनुमंत अगाधा ।
दु:ख पावत जन केहि अपराधा ॥१७॥

पूजा जप तप नेम अचारा।
नहिं जानत कछु दास तुम्हारा ॥१८॥

वन उपवन, मग गिरि गृह माहीं ।
तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ॥१९॥

पांय परों कर जोरि मनावौं ।
यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ॥२०॥

जय अंजनि कुमार बलवन्ता ।
शंकर सुवन वीर हनुमंता ॥२१॥

बदन कराल काल कुल घालक ।
राम सहाय सदा प्रति पालक ॥२२॥

भूत प्रेत पिशाच निशाचर ।
अग्नि बेताल काल मारी मर ॥२३॥

इन्हें मारु तोहिं शपथ राम की ।
राखु नाथ मरजाद नाम की ॥२४॥

जनकसुता हरि दास कहावौ ।
ताकी शपथ विलम्ब न लावो ॥२५॥

जय जय जय धुनि होत अकाशा ।
सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा ॥२६॥

चरण शरण कर जोरि मनावौ ।
यहि अवसर अब केहि गौहरावौं ॥२७॥

उठु उठु चलु तोहिं राम दुहाई ।
पांय परौं कर जोरि मनाई ॥२८॥

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता ।
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥२९॥

ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल ।
ॐ सं सं सहमि पराने खल दल ॥३०॥

अपने जन को तुरत उबारो ।
सुमिरत होय आनन्द हमारो ॥३१॥

यह बजरंग बाण जेहि मारै ।
ताहि कहो फिर कौन उबारै ॥३२॥

पाठ करै बजरंग बाण की ।
हनुमत रक्षा करैं प्राण की ॥३३॥

यह बजरंग बाण जो जापै ।
तेहि ते भूत प्रेत सब कांपे ॥३४॥

धूप देय अरु जपै हमेशा ।
ताके तन नहिं रहै कलेशा ॥३५॥

॥ दोहा ॥

प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान ॥

बजरंग बाण की रचना संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने उस समय की, जब उनके ऊपर हर ओर से तंत्र आदि के माध्यम से प्रेत पिसाच भूत आदि के द्वारा आक्रमण किया जा रहा था। इन सबसे तुलसीदास जी अत्यंत पीड़ित होकर भगवान श्री हनुमान जी से प्रार्थना करने लगे। यही प्रार्थना है “श्री बजरंग बाण”।

बजरंग बाण हर प्रकार की भूत प्रेत आदि की बाधा से मुक्ति दिलाता है, एवम् ऐसे कार्य के लिए अमोघ अस्त्र के रूप में कार्य करता है, इसलिए इसका नाम बजरंग बाण है।

बजरंग बाण 4 चरणों में कहा गया है, जो इस प्रकार से है:-

  1. निश्चय प्रेम प्रतीति ते विनय करें सनमान, तेहि के कारज सकल शुभ सिद्ध करें हनुमान।। यहां पर ये बताया गया है की हनुमान जी किनके कार्य सिद्ध करते हैं। यानी निश्चय के साथ या संकल्प लेकर प्रेम पूर्वक जो विनय से झुककर श्री हनुमान जी से प्रार्थना करेगा, उसके सभी कार्य हनुमान जी स्वयं सिद्ध कर देंगे।
  2. जय हनुमंत संत हितकारी सुन लिजै प्रभु विनय हमारी…. से लेकर।। लाह समान लंक जर गई, जय जय ध्वनि सुरपुर नभ भई।। यहां तक जो भाग में इसमें श्री हनुमान जी स्तुति की गई, उनकी महिमा का बखान किया गया है की कैसे उन्होंने सिंधु लांघा, सुरसा की परीक्षा पार करी, कैसे अक्षय कुमार का संघार किया, लंका विध्वंस किया, सीता माता का पता लगाया, विभीषण को सुख प्रदान किया।

जब हम अपने किसी बड़े से कोई कार्य सिद्ध कराते हैं तो पहले विधिवत उसकी महिमा कहते हैं उसे प्रसन्न करते हैं उसकी स्तुति करते हैं, यही नियम है और यही कार्य तुलसीदास जी ने किया है। एवम् हमे भी ये सदैव ध्यान रखना चाहिए की अपने से श्रेष्ठ के सम्मुख किस प्रकार से अपनी प्रार्थना रखनी चाहिए यही तुलसीदास जी ने हमें बताया है।

  1. अब विलंब केही कारण स्वामी, कृपा करूह उर अंतर्यामी से लेकर।। अपने जन को तुरंत उबारो, सुमिरत होय आनंद हमारे।।

अब हनुमान जी की विधिवत स्तुति करने के उपरांत तुलसीदास जी ने अपनी समस्या श्री हनुमानजी को बताई है एवम् अपनी असमर्थता बताते हुए यहां पर समर्पण करते हुए श्री हनुमान जी को अनेक प्रकार से शपथ दिलाई की प्रभु दया करो, रक्षा करो, कल्याण करो। भूत, प्रेत, पिसाच, निशाचर, अग्निबेताल, काल, मारी, मार इन्हे मारने की शपथ दिलाई हनुमान जी को, पूजा, जप, तप, विधि विधान, आचार विचार कुछ नही जानता आपका ये दास, परंतु किसी अवस्था में भी आपके नाम से सहारे कही भी रह सकते हैं चाहे वन उपवन हो या कोई अन्य स्थान। अर्थात जब अपने श्रेष्ठ से, गुरु से माता पिता से अपनी समस्या या व्यथा बताता हो तो फिर पूर्ण रूप से बिना संकोच के सब बता देना चाहिए कुछ भी नही छुपाना चाहिए। एवम् प्रेमवश यदि शपथ भी देना पड़े तो इसमें भी कोई दोष नही है। यही तुलसीदास जी ने बताया है।

  1. यह बजरंग बाण जेहि मारए ताहि कहो फिर कवन उबारय, पाठ करे बजरंग बाण की हनुमत रक्षा करै प्राण की।। से लेकर।। धूप देय जो जपे हमेशा, तन नही ताके रहे कलेशा।।

जैसा की अधिकतर स्तोत्र एवम् स्तुति में होता अंतिम में उसकी फलश्रृति कही गई है कि, बजरंग पाठ करने से क्या क्या लाभ होगा। बजरंग बाण पाठ करने वाले को भूत प्रेत आदि से भय नहीं होता, उसके शरीर के क्लेश समाप्त होने लगते हैं, एवम् सबसे महत्वपूर्ण की जो बजरंग बाण का पाठ करेगा हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा अवश्य करेंगे।

 

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